संत कबीर को भी यही कहना पड़ा - सातों समुद्रों की स्याही बना डालूँ, सारे वनों को लेखनी (कलम) और सारी पृथ्वी को कागज के रूप में ग्रहण करूँ तो भी प्रभु के गुणों का वर्णन संभव नहीं। योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ईश्वर की विशेषताओं को कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त कर रहे हैं - क्लेश, कर्म, विपाक और आशय - इन चारों से जो संबंधित नहीं है तथा जो समस्त पुरुषों में विशेष है, वह ईश्वर है। अर्थात ईश्वर सभी प्रकार के दुःखों, कर्मों व कर्मफलों से अछूता है। उस ईश्वर में सर्वज्ञता का बीज है, ईश्वर का ज्ञान नहीं सर्वोच्च है; क्योंकि वह ईश्वर गुरुओं का भी गुरु है और काल की सभी सीमाओं से परे है। और उस ईश्वर का नाम प्रणव (ॐकार) है। अर्थात उस ईश्वर को ॐ के नाम से जाना जाता है।
Saint Kabir also had to say the same thing - if I make the ink of the seven seas, accept all the forests in the form of pen and the whole earth in the form of paper, it is not possible to describe the qualities of God. In the Yoga Sutras, Maharishi Patanjali is expressing the characteristics of God in such a way – Klesha, Karma, Vipaka and Aayat – who is not related to these four and who is special among all men, that is God. That is, God is untouched by all kinds of sorrows, deeds and results of actions. In that God is the seed of omniscience, not the knowledge of God is supreme; Because that God is also the Guru of the Gurus and is beyond all limits of time. And the name of that God is Pranav (Omkar). That is, that God is known as Om.
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नास्तिकता की समस्या का समाधान शिक्षा व ज्ञान देने वाले को गुरु कहते हैं। सृष्टि के आरम्भ से अब तक विभिन्न विषयों के असंख्य गुरु हो चुके हैं जिनका संकेत एवं विवरण रामायण व महाभारत सहित अनेक ग्रन्थों में मिलता है। महाभारत काल के बाद हम देखते हैं कि धर्म में अनेक विकृतियां आई हैं। ईश्वर की आज्ञा के पालनार्थ किये जाने वाले यज्ञों...
मर्यादा चाहे जन-जीवन की हो, चाहे प्रकृति की हो, प्रायः एक रेखा के अधीन होती है। जन जीवन में पूर्वजों द्वारा खींची हुई सीमा रेखा को जाने-अनजाने आज की पीढी लांघती जा रही है। अपनी संस्कृति, परम्परा और पूर्वजों की धरोहर को ताक पर रखकर प्रगति नहीं हुआ करती। जिसे अधिकारपूर्वक अपना कहकर गौरव का अनुभव...