प्रस्तुत मत्रांश (अवृकेभिः पथिभी रायः नु स्वस्ति नः- ऋग्वेद 6.4.8) में जीवन का व्यवहार बताया गया है। मन्त्र का ऋषि भारद्वाज है। जो अपने में वाज को भरता है वह भरद्-वाज कहलाता है। वाज को उल्टा जव होता है। जव का अर्थ है, तीव्रता, गति, भागना, दौड़ना। अपने अन्दर गति का सामर्थ्य भरने वाले को भरद्-वाज कहेंगे। भर-द्वाज का दर्शन यह है कि मनुष्य की इच्छाएँ दो प्रकार की होती हैं। पहली रयि की, और दूसरी स्वस्ति की। रूढ़ का अर्थ में, रयि धन के अर्थ में, तो स्वस्ति कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। रयि शब्द रा धातु से बना है। यह वही रा धातु है जिससे राष्ट्र शब्द बनता है। रा का अर्थ है देना। देने योग्य चीज को दूसरों को नहीं देता है अ-राति कहलाता है। इसी अर्थ में अरि शब्द भी लोक में प्रचलित है।
Ved Katha Pravachan - 12 (Explanation of Vedas) वेद कथा - प्रवचन एवं व्याख्यान Ved Gyan Katha Divya Pravachan & Vedas explained (Introduction to the Vedas, Explanation of Vedas & Vaidik Mantras in Hindi) by Acharya Dr. Sanjay Dev
स्वस्ति वह है जो अपने पास ही रहे, दूसरों को जिसे हम न दे सकें। सु-अस्ति। अस्ति का अर्थ है होना और वह होना भी सु हो। यदि हमारे पास स्वस्ति हो तो हमारे द्वारा दी जाने वाली हर वस्तु सु ही होगी। रयि स्थूल है, स्वस्ति सूक्ष्म। इस प्रकार सारी उपलब्धि को मन्त्र में रायः और स्वस्ति, इन दो भागों में बाँट दिया गया है। मन्त्र में भगवान् से प्रार्थना की गई है- हमारे पास रयि भी हो दूसरों को देने के लिए, और स्वस्ति हो आत्म-विस्तार के लिए। मन की प्रसन्नता तभी प्रकट होती है जब हम कुछ न कुछ देते हैं।
अभी हम स्वामीजी के विचार सुन रहे थे। उन्होंने सु-विचार-दान की महत्ता बताई। वैचारिक धरातल पर, विचारदान सबसे बहक दान है! पर भौतिक धरातल पर भी हम बहुत कुछ दे सकते हैं। हम अन्न, वस्त्र, द्रव्य आदि का दान कर सकते हैं। अपना काम भी चलाए, और दूसरों को भी दें। हमारे पास देने के लिए कुछ न हो, यह दरिद्रता है। पर पास में होने पर भी न देता भी द्ररिदता है। पर पास में होने पर भी न देना भी दरिद्रता ही है। पर पास में होने पर भी न देना भी दरिद्रता ही है। ऐसे व्यक्ति को रयिमान् नहीं कहेंगे। मन्त्र में रयि और स्वस्ति की उपलब्धि हेतु मार्ग का निर्देश एक दृष्टांत के रूप में किया गया है। अवृकेभिः पथिभिः, अवृक मार्ग हम रयि को प्राप्त करें। वृक भेड़िए को कहते हैं। भेड़िए से भिन्न हमारा मार्ग हो। हमारे आज के जीवन को देखने से पता चलेगा कि हमारे अन्दर एक भेड़िया है, जो हमारे सारे महत्वपूर्ण आयोजनों को विफल कर देता है। न ही यह आत्म-कल्याण का और न ही बाह्य व्यवहार का मार्ग है। 41 वर्ष में देश के विकास के लिए हमने सात पंचवर्षीय योजनाएँ बनाईं। उनमें से कम से कम हमें सात कदम आगे बढ़ जाना चाहिए था। परन्तु हर योजना में किसी की तिजौरी अथवा घर भरने के निहित स्वार्थ के कारण देश का विकास न हो सका। वह तिजौरी भी यदि सबके लिए हो तो कोई बात नहीं। पहले राजा की षष्ठांश वृत्ति होती थी। प्रजा अपनी आय का छठा हिस्सा निश्चित स्थान पर रख देती थी। उसे कोई नहीं ले जाता था। आर्यावर्त की विशेषताओं में एक विशेषता यह भी बताई गई है कि आर्यावर्त वह है जिसमें कस्तूरी मृग निर्भय विचरते हैं। सोने से भी कई गुना मूल्यवान कस्तूरी है। यहां के निवासी पुरुषार्थ से पाने में विश्वास करते हैं, छीनते नहीं हैं। किसी जानवर को मारकर कुछ प्राप्त करना हमारा रास्ता नहीं है। वह तो हिंसा का मार्ग है। हम प्रकृति का दोहन इस प्रकार करें कि जितना कुछ हमें चाहिए वह दे दे। जितना कुछ से तात्पर्य है, हमारे पास भी हो और दूसरों को भी दे सकें। रघुवंश में राजाओं की विशेषता बताई है कि वे अर्थों का संभरण त्याग के लिए करते थे, त्यागाय संभातार्थानाम्।
हमारे देश में लगभग 36 संवत् प्रचलित हैं। संवत् चलाने वाले राजा को शाकपार्थिव कहा जाता था। शाकपार्थिव राजा अतिसमर्थ होते थे। पुरु-शाक इन्द्र को कहा जाता है- ऐसा राजा जो तीनों प्रकार के ऋणों से मुक्त हो। भौतिक रूप में भी वह किसी का ऋणी न हो। उसके यहाँ सुसन्तान हो। देवों को यज्ञ से सन्तुष्ट कर दिया हो। समय पर वर्षा होती हो। रत्न व धन-धान्य सहज उपलब्ध हों। व्यक्ति जब इस प्रकार धन्य हो जाए तो वह धन एकत्र करता था। उसके द्वारा एकत्र धन भी व्यक्ति व्यक्ति का धन होता था, किसी एक व्यक्ति का नहीं। एकाकी दृष्टि से, जिसे हमने अपनाया है, निन्दित कही गई है। उसी दृष्टि से हमारा देश दरिद्र हो गया है। दृष्टि बदलने पर आज भी हम धनी हो सकते हैं। महात्मा गाँधी के पास कुछ नहीं था। एक धोती को ही वह पहनते-ओढ़ते थे। फिर भी पूछने पर वे कहते थे, मैं बहुत धनी हूँ, कोई पूछता, वह धन कहाँ हैं? वे कहते, तुम्हारी जेब में। किसी की तिजोरी में बन्द पैसा मेरा है।
समाज में इतनी आत्मीयता बढ़ जाए, तभी हम अपने को धनी मान सकते हैं। 13 सौ खरब रुपयों का धन जहाँ केवल मंदिरों में है, ऐसा राष्ट्र भी कभी निर्धन हो सकता है? हमारे अन्दर यश की, प्रतिष्ठा की भावना भी यदि है तो वह वृक मार्ग है। मैंने धन दान दिया है, मेरा नाम होना चाहिए, वह उचित नहीं है। बाँटते रहो। किसी बही में लिखवाने की क्या आवश्यकता है? मैंने यथाशक्ति दे दिया, इससे बड़ी और क्या बही होगी?
हम ऐसा धन एकत्र करें जो दूसरों को भी दे सकें। वेद का आदेश है, अवृक मार्गों से ही हम धन प्राप्त करें। अवृक पथ से धन एकत्र करने वाला व्यक्ति धन्य है। हम स्वयं धन्य बनें, समाज और राष्ट्र को भी धन्य बना सकें, प्रमु हमें ऐसी दृष्टि दें।
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Health is that which remains with us, which we cannot give to others. Su-asti. Aasti means to be and that it should also be good. If we have health, then everything we give will be the same. The chariot is gross, the health subtle. Thus the entire achievement is divided into two parts of the mantra, Raya and Swasti. In the mantra, God has been prayed - we should have a chariot to give to others, and be healthy for self-expansion. Happiness of the mind only appears when we give something.
आर्यों का मूल निवास आर्यों के मूल निवास के विषय में महर्षि दयानन्द का दृढ कथन है कि सृष्टि के आदि में मानव तिब्बत की धरती पर उत्पन्न हुआ था। तिब्बत में पैदा होने वालों में आर्य भी थे और दस्यु भी थे। स्वभाव के कारण उनके आर्य और दस्यु नाम हो गये थे। उनका आपस में बहुत विरोध बढ गया, तब आर्य लोग उस...
नास्तिकता की समस्या का समाधान शिक्षा व ज्ञान देने वाले को गुरु कहते हैं। सृष्टि के आरम्भ से अब तक विभिन्न विषयों के असंख्य गुरु हो चुके हैं जिनका संकेत एवं विवरण रामायण व महाभारत सहित अनेक ग्रन्थों में मिलता है। महाभारत काल के बाद हम देखते हैं कि धर्म में अनेक विकृतियां आई हैं। ईश्वर की आज्ञा के पालनार्थ किये जाने वाले यज्ञों...
मर्यादा चाहे जन-जीवन की हो, चाहे प्रकृति की हो, प्रायः एक रेखा के अधीन होती है। जन जीवन में पूर्वजों द्वारा खींची हुई सीमा रेखा को जाने-अनजाने आज की पीढी लांघती जा रही है। अपनी संस्कृति, परम्परा और पूर्वजों की धरोहर को ताक पर रखकर प्रगति नहीं हुआ करती। जिसे अधिकारपूर्वक अपना कहकर गौरव का अनुभव...